Iran America War: पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल और सियासी हलचल
लेखक: उमाशंकर सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।
Iran America War के बीच पाकिस्तान की भूमिका अचानक वैश्विक सुर्खियों में आ गई है। हालात तब और दिलचस्प हो गए जब व्हाइट हाउस की ओर से घोषणा की गई कि 10 अप्रैल को अमेरिकी वार्ताकारों का एक उच्चस्तरीय दल इस्लामाबाद जाएगा। इस दल का नेतृत्व J. D. Vance करेंगे, जबकि उनके साथ Steve Witkoff और Jared Kushner भी शामिल होंगे।
करीब 15 वर्षों बाद ऐसा पहली बार हो रहा है कि अमेरिका का कोई उपराष्ट्रपति पाकिस्तान का दौरा कर रहा है। यह दौरा न केवल Iran America War के संदर्भ में अहम है, बल्कि Donald Trump प्रशासन और पाकिस्तान के बढ़ते रिश्तों का संकेत भी देता है।
Iran America War: सीज़फ़ायर में पाकिस्तान की भूमिका: क्यों बना मध्यस्थ?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस पहल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं—
- कुछ लोग पाकिस्तान की आलोचना कर रहे हैं
- कुछ उसकी सराहना कर रहे हैं
- जबकि एक वर्ग संतुलित विश्लेषण की मांग कर रहा है
असल सवाल यह है कि Iran America War में पाकिस्तान ही मध्यस्थ क्यों बना?
पहले इस भूमिका में Oman था, जिसने दावा किया था कि ईरान और अमेरिका परमाणु समझौते के करीब हैं। लेकिन कुछ ही घंटों बाद Israel और अमेरिका के हमलों ने उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया।
इसके बाद जब संघर्ष बढ़ा, तो ईरान ने खाड़ी देशों—Saudi Arabia, UAE, Qatar, Kuwait और Bahrain—को निशाना बनाना शुरू कर दिया। ये देश सीधे संघर्ष का हिस्सा बन गए, इसलिए मध्यस्थ नहीं रह सकते थे।
Iran America War: अन्य देश क्यों नहीं बने मध्यस्थ?
- Turkey: ईरान के साथ क्षेत्रीय टकराव और सीरिया मुद्दे के कारण स्वीकार्य नहीं
- Egypt: सीमित और पर्दे के पीछे भूमिका
- यूरोपीय देश: ट्रंप प्रशासन से तनाव और ईरान-रूस समीकरण के कारण दूर
- Russia: खुद यूक्रेन युद्ध में उलझा
- China: पर्दे के पीछे सक्रिय, लेकिन सामने पाकिस्तान को आगे किया
इस तरह पाकिस्तान एक “सुविधाजनक विकल्प” बनकर उभरा।
Pakistan और America के रिश्ते: कूटनीतिक गणित
पाकिस्तान अमेरिका के लिए इसलिए भी उपयुक्त है क्योंकि वहां राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच संतुलन बना हुआ है। Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख के बीच समीकरणों का फायदा अमेरिका उठा रहा है।
ट्रंप प्रशासन ने मध्यस्थता का श्रेय दोनों—राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व—को दिया, जिससे पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति संतुलित बनी रहे।
सीज़फ़ायर पर संकट: Lebanon बना सबसे बड़ा मुद्दा
हालांकि Iran America War में सीज़फ़ायर की कोशिशें जारी हैं, लेकिन Lebanon को लेकर विवाद गहरा गया है।
- Israel ने साफ किया कि लेबनान सीज़फ़ायर का हिस्सा नहीं है
- हमलों में भारी नुकसान हुआ, दर्जनों लोगों की मौत
- ईरान ने चेतावनी दी कि वह बातचीत से हट सकता है
ईरान के मुख्य वार्ताकार Mohammad Bagher Ghalibaf ने भी समझौते की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया है।
क्या सफल होगी पाकिस्तान की मध्यस्थता?
पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास न तो अमेरिका पर दबाव बनाने की ताकत है, न ही ईरान को पूरी तरह मनाने की क्षमता।
फिर भी, Iran America War के बीच उसकी कोशिशों को कई देशों ने सराहा है। पाकिस्तान ने भी चीन, सऊदी अरब, तुर्किए, कतर और मिस्र जैसे देशों का समर्थन मिलने की बात कही है।
भारत क्यों नहीं बना मध्यस्थ?
India की विदेश नीति पारंपरिक रूप से सक्रिय मध्यस्थता की नहीं रही है। भारत हमेशा संवाद और कूटनीति के पक्ष में रहा है, लेकिन सीधे मध्यस्थ बनने से बचता रहा है।
Iran America War– निष्कर्ष
Iran America War के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता एक अवसर भी है और परीक्षा भी। जहां एक तरफ इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत हो सकती है, वहीं लेबनान जैसे मुद्दों पर विफलता उसकी सीमाओं को उजागर कर सकती है। आखिरकार, यह तय करेगा कि पाकिस्तान का कद वैश्विक राजनीति में बढ़ेगा या घटेगा।