Jharkhand High Court: महिला की साड़ी उठाना अपने आप में दुष्कर्म का प्रयास नहीं, कोर्ट ने बताई कानूनी वजह
रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के घर में प्रवेश करना और उसके कपड़े उठाना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। किसी कृत्य को दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में रखने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपी की मंशा और ऐसे ठोस कृत्य का प्रमाण देना जरूरी है, जो दुष्कर्म करने की दिशा में स्पष्ट रूप से आगे बढ़ता हो।
इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि गंभीर यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालत केवल आरोप की प्रकृति के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालती, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपी की कथित मंशा को कानूनी कसौटी पर परखती है।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक महिला के घर में आरोपी के प्रवेश से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी महिला के घर में पहुंचा और उसके कपड़े उठाने की कोशिश की। घटना के बाद आरोपी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया और उस पर दुष्कर्म के प्रयास से संबंधित आरोप लगाए गए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या आरोपी का कथित कृत्य इतना आगे बढ़ चुका था कि उसे कानूनी रूप से दुष्कर्म के प्रयास के रूप में माना जा सके।
अदालत ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करते हुए कहा कि केवल महिला के कपड़े उठाने या उसके साथ आपत्तिजनक व्यवहार करने से यह स्वतः साबित नहीं हो जाता कि आरोपी ने दुष्कर्म करने का प्रयास किया था। इसके लिए घटना के दौरान आरोपी की स्पष्ट मंशा और दुष्कर्म करने की दिशा में उठाए गए ठोस कदम का होना जरूरी है।
Attempt to Rape के लिए क्या जरूरी है?
कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि दुष्कर्म का प्रयास और महिला की गरिमा भंग करने वाला कृत्य कानूनी रूप से हमेशा एक ही अपराध नहीं होते।
किसी व्यक्ति पर दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं होता कि उसने महिला के साथ अनुचित व्यवहार किया। अदालत को यह भी देखना होता है कि आरोपी की मंशा क्या थी और क्या उसने उस अपराध को पूरा करने की दिशा में कोई ऐसा स्पष्ट कदम उठाया था, जिससे उसकी आपराधिक मंशा सामने आती हो।
यानी किसी घटना में अनुचित स्पर्श, कपड़े खींचना या अन्य आपत्तिजनक व्यवहार गंभीर अपराध हो सकता है, लेकिन प्रत्येक मामले में उसे स्वतः दुष्कर्म के प्रयास की कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अंतिम निर्णय मामले के तथ्यों, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
कोर्ट ने इरादे और कृत्य पर दिया जोर
Jharkhand High Court की टिप्पणी का केंद्रीय बिंदु आरोपी की मंशा और उसके वास्तविक कृत्य के बीच संबंध है। अदालत ने माना कि दुष्कर्म के प्रयास का अपराध तभी बनता है जब आरोपी की कार्रवाई उस अपराध को अंजाम देने की दिशा में पर्याप्त रूप से आगे बढ़ी हो।
कानून में किसी अपराध की तैयारी और उसके प्रयास के बीच अंतर माना जाता है। प्रयास के मामले में केवल इच्छा या प्रारंभिक तैयारी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि आरोपी की ओर से ऐसा प्रत्यक्ष कृत्य होना चाहिए जो अपराध को पूरा करने की दिशा में हो।
इसी कानूनी कसौटी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मामले का मूल्यांकन किया। अदालत की टिप्पणी का उद्देश्य यह तय करना था कि उपलब्ध तथ्यों से दुष्कर्म के प्रयास के आरोप के लिए आवश्यक कानूनी तत्व साबित होते हैं या नहीं।
महिला के साथ आपत्तिजनक व्यवहार को हल्के में नहीं देखा जा सकता
यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि महिला के साथ जबरन या आपत्तिजनक व्यवहार को सामान्य माना गया है। महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से जुड़े अपराधों के लिए भारतीय कानून में अलग-अलग प्रावधान मौजूद हैं।
किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार, उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना या उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक हस्तक्षेप करना अपने आप में गंभीर कानूनी मामला हो सकता है। हालांकि, किस घटना पर कौन-सी कानूनी धारा लागू होगी, यह मामले के विशिष्ट तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करता है।
फैसले से क्या समझना चाहिए?
Jharkhand High Court की इस टिप्पणी से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है। गंभीर आरोपों वाले मामलों में अदालत को यह जांचना होता है कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य संबंधित अपराध के प्रत्येक आवश्यक तत्व को साबित करते हैं या नहीं।
दुष्कर्म के प्रयास के मामले में आरोपी की कथित मंशा के साथ-साथ उसका प्रत्यक्ष कृत्य भी महत्वपूर्ण होता है। केवल संदिग्ध या आपत्तिजनक व्यवहार के आधार पर किसी व्यक्ति को दुष्कर्म के प्रयास का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कानून के अनुसार आवश्यक तत्व साक्ष्यों से स्थापित न हों।
इस फैसले की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि यह बताता है कि अदालतें यौन अपराधों से जुड़े मामलों में आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ कानूनी तत्वों और साक्ष्यों को भी समान रूप से महत्व देती हैं। प्रत्येक मामले में फैसला उसके अपने तथ्यों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर किया जाता है।