धर्मान्तरित आदिवासियों को मिल रहा 90% आरक्षण का लाभ, ST आरक्षण में “क्रीमी लेयर” लाने की जरूरत: Nisha Oraon IRS
रांची, झारखंड: वर्तमान समय में झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में Nisha Oraon (IRS) एक अत्यंत प्रभावशाली नाम बनकर उभरी हैं। वरिष्ठ राजनेता रामेश्वर उरांव की सुपुत्री और एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपनी पहचान रखने वाली Nisha Oraon IRS इन दिनों आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए सुर्खियों में हैं।
आरक्षण व्यवस्था में ‘क्रीमी लेयर’ की मांग
Nisha Oraon ने अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण के मौजूदा लाभों के वितरण पर एक नई वैचारिक बहस शुरू कर दी है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं:
- लाभ का असमान वितरण: उनका तर्क है कि आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 90%, उन लोगों तक जा रहा है जो धर्मांतरित हो चुके हैं।
- क्रीमी लेयर का प्रस्ताव: Nisha Oraon का मानना है कि एसटी आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ लागू करना अनिवार्य है। उनके अनुसार, ऐसा करने से ही उन “गरीब सरना आदिवासियों” को न्याय मिल पाएगा जो आर्थिक और सामाजिक रूप से आज भी पिछड़े हुए हैं।
- न्यायालय और राज्य की शक्ति: उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि अदालत ने अब राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया है कि वे आरक्षण के भीतर वर्गीकरण कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचा सकें।
डिलिस्टिंग और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा
आदिवासी समाज की पहचान को लेकर भी Nisha Oraon के विचार काफी स्पष्ट और चर्चा का विषय हैं।
- डिलिस्टिंग का समर्थन: वह ‘डिलिस्टिंग’ (धर्मांतरण करने वालों को एसटी लाभों से वंचित करना) के पक्ष में मजबूती से खड़ी दिखती हैं। उनका मानना है कि यह प्रक्रिया आदिवासियों की उनकी मूल जड़ों की ओर “घर वापसी” का मार्ग प्रशस्त करेगी।
- सरना और सनातन का संबंध: Nisha Oraon अक्सर कहती हैं कि सरना और सनातन परंपराओं के बीच एक गहरा प्राकृतिक संबंध है, क्योंकि दोनों का मूल आधार प्रकृति की वंदना करना ही है।
प्रशासनिक अनुभव और पेसा (PESA) कानून
पूर्व में पंचायती राज निदेशक के पद पर कार्य कर चुकीं Nisha Oraon ने राज्य में लागू पेसा नियमावली की खामियों को भी उजागर किया है।
- उनका आरोप है कि वर्तमान नियमों में आदिवासियों के ‘कस्टमरी लॉ’ (पारंपरिक कानूनों) की अनदेखी की गई है।
- वह निरंतर मांग कर रही हैं कि ग्राम सभाओं को उनकी वास्तविक शक्तियां वापस मिलनी चाहिए ताकि आदिवासी स्वशासन का सपना सच हो सके।
निष्कर्ष: एक उभरता हुआ सामाजिक नेतृत्व
यद्यपि Nisha Oraon के बयानों को लेकर कुछ राजनीतिक हलकों में विरोध भी हो रहा है, लेकिन सरना आदिवासी समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक “Strong Leader” के तौर पर देख रहा है। झारखंड की आगामी राजनीति में Nisha Oraon के द्वारा उठाए गए ये मुद्दे निस्संदेह एक निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
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