रांची, झारखंड : झारखंड की प्रशासनिक और सामाजिक राजनीति के पटल पर इन दिनों भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की अधिकारी Nisha Oraon एक सशक्त और वैचारिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरी हैं। वरिष्ठ राजनेता डॉ. रामेश्वर उरांव की सुपुत्री होने के साथ-साथ, अपनी प्रशासनिक दूरदर्शिता के कारण Nisha Oraon आज उन ज्वलंत मुद्दों पर मुखर हैं, जो सीधे तौर पर राज्य के मूल सरना आदिवासियों के भविष्य से जुड़े हैं।
Nisha Oraon ने वर्तमान अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण की विसंगतियों पर एक नया विमर्श शुरू किया है। सोशल मीडिया पर साझा की गई उनकी हालिया पोस्ट (संदर्भ: 123037.png) ने प्रशासन और समाज दोनों का ध्यान खींचा है। उनके तर्कों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
संसाधनों का केंद्रीकरण:Nisha Oraon का तर्क है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का लगभग 90% लाभ उन परिवारों को मिल रहा है जो धर्मांतरित हो चुके हैं या पहले से ही संपन्न हैं।
क्रीमी लेयर का प्रस्ताव: उन्होंने पुरजोर मांग की है कि एसटी आरक्षण में भी “क्रीमी लेयर” का प्रावधान लागू होना चाहिए। उनका मानना है कि जब तक समृद्ध तबके को इससे बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक अंतिम पायदान पर खड़े “गरीब सरना आदिवासी” को उचित अवसर नहीं मिल पाएंगे।
राज्य सरकार की भूमिका: उन्होंने स्पष्ट किया कि माननीय न्यायालय के निर्णय के बाद अब राज्य सरकार के पास यह शक्ति है कि वह आरक्षण के भीतर वर्गीकरण कर समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाए।
डिलिस्टिंग : सांस्कृतिक अस्मिता और ‘घर वापसी’ का मार्ग
धार्मिक पहचान और आरक्षण के लाभों के बीच के संबंध पर Nisha Oraon के विचार अत्यंत स्पष्ट हैं।
धर्मांतरण और पहचान: वह ‘डिलिस्टिंग’ (धर्मांतरित व्यक्तियों को आरक्षण की सूची से बाहर करना) की प्रक्रिया का समर्थन करती हैं। उनका दावा है कि डिलिस्टिंग से उन आदिवासियों की “घर वापसी” सुगम होगी जिन्होंने अपनी मूल संस्कृति छोड़ दी है।
सरना-सनातन समन्वय:Nisha Oraon ने विभिन्न मंचों पर यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि सरना और सनातन दोनों ही परंपराएं प्रकृति पूजा पर आधारित हैं और इनकी सांस्कृतिक जड़ें एक ही हैं।
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स्वशासन और पेसा (PESA) नियमावली पर कड़ा रुख
पूर्व पंचायती राज निदेशक के रूप में कार्य कर चुकीं Nisha Oraon ने झारखंड सरकार की नई PESA नियमावली पर भी गंभीर आपत्ति जताई है।
उनका आरोप है कि वर्तमान नियमावली से ‘कस्टमरी लॉ’ (पारंपरिक कानून) को कमजोर किया गया है।
उन्होंने मांग की है कि ग्राम सभाओं को उनकी पारंपरिक और रूढ़िवादी शक्तियों के साथ सशक्त किया जाए, ताकि आदिवासियों का वास्तविक स्वशासन सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष : एक नई वैचारिक क्रांति की ओर?
हालांकि Nisha Oraon के विचारों को लेकर राज्य में एक राजनीतिक ध्रुवीकरण भी देखा जा रहा है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह आज सरना आदिवासियों के अधिकारों के लिए एक “Strong Voice” बन चुकी हैं। उनकी सक्रियता ने झारखंड में ‘आरक्षण सुधार’ और ‘सांस्कृतिक संरक्षण’ को मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बना दिया है।