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Jharkhand Minerals Cess Controversy: खनिज सेस पर केंद्र से क्यों भिड़े हेमंत सोरेन? ₹14,000 करोड़ के राजस्व का क्या है पूरा मामला

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रांची: झारखंड की जमीन के नीचे मौजूद खनिज अब एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार के बीच बड़े टकराव की वजह बन गए हैं। संसद से पारित Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 ने राज्यों के mineral rights और mineral-bearing land पर tax, cess तथा दूसरी levies लगाने की शक्तियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सबसे ज्यादा चिंता झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों में दिखाई दे रही है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे पर केंद्र के खिलाफ तीखा रुख अपनाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संशोधन पर पुनर्विचार की मांग की है और राज्य के अधिकारों तथा संभावित राजस्व नुकसान का मुद्दा उठाया है। रिपोर्टों के मुताबिक सोरेन ने बाद में इस कानून के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी भी दी।

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ दो साल पहले, जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने राज्यों के mineral rights पर tax लगाने के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अब सवाल यह है कि 2026 का नया कानून उस संवैधानिक स्थिति को किस हद तक बदलता है।

Jharkhand Minerals Cess Controversy क्या है?

पूरे मामले का केंद्र है mineral-bearing land cess यानी ऐसी जमीन पर लगाया जाने वाला सेस जिसमें खनिज मौजूद हैं।

झारखंड विधानसभा ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद Jharkhand Mineral-Bearing Land Cess Bill, 2024 पारित किया था। इसका उद्देश्य राज्य के लिए अतिरिक्त revenue जुटाना था।

लेकिन 2026 के MMDR Amendment ने स्थिति बदल दी है।

नए कानून में MMDR Act के दायरे में “mineral-bearing lands” को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। साथ ही Section 9D के जरिए राज्यों की mineral rights या mineral-bearing land पर quantity, mineral value, royalty या समान आधार पर tax, cess या अन्य levy लगाने की क्षमता को केंद्र द्वारा निर्धारित conditions और restrictions के अधीन कर दिया गया है।

यही प्रावधान झारखंड सरकार के विरोध का मुख्य कारण है।

झारखंड के लिए इतना बड़ा मुद्दा क्यों है?

झारखंड की सरकारी आय में mining sector की भूमिका बहुत बड़ी है। इसलिए mineral cess को लेकर होने वाला कोई भी बदलाव सीधे राज्य के fiscal space को प्रभावित कर सकता है।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक झारखंड का Mineral Bearing Land Cess 2025-26 में लगभग ₹7,488 करोड़ जुटा चुका था। 2026-27 के लिए इससे लगभग ₹13,215 करोड़ की आय का अनुमान लगाया गया था।

यानी यह कोई छोटी revenue stream नहीं है। यदि राज्य इस तरह की levy लगाने या उससे revenue हासिल करने की क्षमता खो देता है, तो उसके बजट पर दबाव बढ़ सकता है।

झारखंड सरकार का कहना है कि mining revenue का इस्तेमाल केवल सरकारी प्रशासन चलाने के लिए नहीं होता, बल्कि welfare और development programmes के लिए भी किया जाता है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा:

«“Minerals belong to Jharkhand, land belongs to Jharkhand, so why should Delhi decide on our rights and entitlements?”»

यह बयान इस विवाद की राजनीतिक दिशा को भी स्पष्ट करता है—राज्य सरकार इसे सिर्फ taxation का मामला नहीं, बल्कि राज्यों के अधिकार और federalism का प्रश्न मान रही है।

₹14,000 करोड़ के नुकसान का दावा कितना बड़ा है?

झारखंड सरकार ने MMDR Amendment से संभावित revenue loss को लेकर करीब ₹14,000 करोड़ का आंकड़ा सामने रखा है। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इसे राज्य के लिए गंभीर वित्तीय चुनौती बताया है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। ₹14,000 करोड़ को राज्य सरकार का अनुमानित नुकसान माना जाना चाहिए, न कि पहले से तय या अंतिम नुकसान। अलग-अलग रिपोर्टों और projections में mineral cess से होने वाली संभावित आय के आंकड़े अलग दिखाई देते हैं।

मसलन, 2026-27 के लिए mineral-bearing land cess से करीब ₹13,215 करोड़ की projection सामने आई है।

इस अंतर का कारण अलग-अलग revenue assumptions और कानून की संभावित व्याख्या हो सकती है।

केंद्र सरकार क्यों चाहती है ऐसी व्यवस्था?

केंद्र का तर्क राज्यों के revenue loss से अलग है।

केंद्र सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों द्वारा minerals पर अलग-अलग taxes और cesses लगाए जाने से domestic minerals की लागत बढ़ सकती है। इससे steel, cement और infrastructure जैसे sectors की input cost प्रभावित हो सकती है।

सरकार का broader argument यह है कि यदि भारतीय minerals घरेलू बाजार में महंगे होते हैं तो industries imported minerals की तरफ जा सकती हैं।

इसलिए केंद्र mineral taxation में अधिक uniformity और predictability चाहता है।

केंद्र का यह भी कहना है कि MMDR Amendment के बाद states की mining-related revenue पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती। Royalty, auction premium, dead rent, District Mineral Foundation (DMF), GST और transit-related charges जैसे दूसरे sources से राज्यों को revenue मिलता रहेगा।

यानी दोनों पक्षों के बीच असली अंतर इस बात पर है कि mineral-rich states को अतिरिक्त taxation power कितनी मिलनी चाहिए और Centre उस power पर कितनी सीमा लगा सकता है।

2024 का Supreme Court फैसला फिर चर्चा में क्यों है?

इस पूरे विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि 2024 के Supreme Court judgment से जुड़ी है।

नौ जजों की Constitution Bench ने जुलाई 2024 में mineral rights taxation को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अदालत ने माना था कि राज्यों के पास mineral rights पर tax लगाने की legislative competence है। Court ने यह भी स्पष्ट किया था कि mining companies द्वारा दी जाने वाली royalty को tax नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही mineral-bearing land को लेकर भी राज्यों की taxation powers पर महत्वपूर्ण observations आए थे।

यही कारण है कि 2026 का MMDR Amendment कई राज्यों के लिए सिर्फ एक नया mining law नहीं, बल्कि 2024 के Supreme Court judgment के बाद बनी constitutional position में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

नया कानून राज्यों की power को कैसे प्रभावित करता है?

संशोधन के बाद mineral-bearing land और mineral rights पर राज्यों की taxation power पहले जैसी unrestricted नहीं रहती।

नए Section 9D के अनुसार quantity या value of minerals, payable royalty अथवा समान आधार पर state-level tax, cess या levy लगाने पर केंद्रीय conditions/restrictions लागू होंगी।

यहां एक technical point भी महत्वपूर्ण है: इसे पूरी तरह “हर तरह के cess पर blanket ban” कहना सही नहीं होगा। कानून में केंद्र द्वारा निर्धारित conditions या restrictions के अनुसार levy की संभावना छोड़ी गई है। लेकिन इससे Centre की भूमिका काफी बढ़ जाती है।

यही constitutional question अब विवाद के केंद्र में है।

पुराने बकाये का क्या होगा?

MMDR Amendment का एक और महत्वपूर्ण पहलू पुराने unpaid या unrecovered levies से जुड़ा है।

रिपोर्टों के अनुसार, पहले लगाए गए लेकिन अभी तक वसूल नहीं किए गए कुछ state levies को नए कानून के तहत invalid माना जाएगा। वहीं जो रकम पहले ही जमा या recover हो चुकी है, उसे वापस करने की जरूरत नहीं होगी।

यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के Supreme Court judgment के बाद राज्यों को पुराने mineral-tax dues की वसूली का रास्ता मिला था।

Supreme Court ने states को past dues recover करने की अनुमति दी थी और April 1, 2005 तक के dues को phased manner में recover करने का रास्ता खुला था।

इसलिए 2026 का संशोधन पुराने dues की recovery को लेकर भी नई कानूनी बहस पैदा करता है।

क्या DMF Fund पर भी असर पड़ेगा?

Mining-affected areas के लिए District Mineral Foundation यानी DMF एक महत्वपूर्ण mechanism है।

DMF funds का इस्तेमाल mining से प्रभावित communities और क्षेत्रों के development तथा welfare के लिए किया जाता है।

अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर MMDR Amendment का DMF collections पर सीधा तत्काल प्रभाव स्पष्ट नहीं है। लेकिन अगर future में royalty structure में बदलाव होता है, तो इसका indirect impact DMF revenue पर पड़ सकता है।

इसलिए mineral cess के साथ-साथ royalty और DMF को भी इस पूरे विवाद में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हेमंत सोरेन का विरोध और तेज आंदोलन की तैयारी

झारखंड सरकार ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भी जोरदार तरीके से उठाया है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र से amendment पर दोबारा विचार करने की मांग की है। उन्होंने इसे राज्य की financial autonomy और development capacity से जोड़ते हुए चिंता जताई है। Business Standard की रिपोर्ट के अनुसार, सोरेन ने प्रस्तावित restrictions को “serious constitutional, fiscal, developmental and federal concerns” वाला बताया।

इसके बाद सोरेन ने राज्यव्यापी आंदोलन की बात भी कही। उन्होंने संशोधन को लेकर केंद्र पर राज्य के अधिकार सीमित करने का आरोप लगाया।

झारखंड सरकार इस मामले को न्यायिक स्तर पर भी चुनौती देने की तैयारी में है।

क्या दूसरे राज्यों पर भी पड़ेगा असर?

यह विवाद सिर्फ झारखंड का मामला नहीं है।

देश के कई mineral-rich states के लिए mining revenue सरकारी finances का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए MMDR Amendment का असर उन राज्यों की taxation policies पर भी पड़ सकता है।

उदाहरण के लिए, कर्नाटक ने mining levy से 2026-27 में लगभग ₹3,000 करोड़ के अतिरिक्त revenue का अनुमान लगाया था। वहीं ओडिशा में पुराने mineral-tax dues को लेकर बड़े financial claims हैं।

इसलिए झारखंड की लड़ाई आगे चलकर mineral-producing states बनाम Centre की व्यापक बहस में बदल सकती है।

राजनीतिक समीकरण भी बदले

इस मुद्दे पर केवल विपक्षी दल ही सवाल नहीं उठा रहे हैं। झारखंड की राजनीति में NDA से जुड़े नेताओं ने भी राज्य के mineral rights और cess की जरूरत पर बात की है।

AJSU प्रमुख सुदेश महतो ने केंद्र से झारखंड को mineral-bearing land पर cess लगाने की अनुमति देने की मांग की है।

इससे संकेत मिलता है कि mineral cess का मुद्दा राज्य की राजनीति में व्यापक समर्थन हासिल कर सकता है।

अब आगे क्या होगा?

अब इस विवाद के तीन संभावित मोर्चे हैं—कानूनी लड़ाई, केंद्र-राज्य बातचीत और राजनीतिक आंदोलन।

यदि झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करती है तो सबसे अहम सवाल होगा कि Parliament द्वारा बनाया गया MMDR law राज्यों की constitutional taxation powers को किस सीमा तक restrict कर सकता है।

दूसरा सवाल यह होगा कि 2024 के Supreme Court judgment के बाद बनी legal position पर 2026 का संशोधन कितना प्रभाव डालता है।

तीसरा पहलू आर्थिक है। अगर mineral cess से राज्य को अपेक्षित revenue नहीं मिलता, तो सरकार को alternative revenue sources तलाशने पड़ सकते हैं।

Bottom Line

Jharkhand Minerals Cess Controversy अब सिर्फ ₹14,000 करोड़ के संभावित revenue loss की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है—भारत के प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले राजस्व पर अंतिम नियंत्रण किसका होना चाहिए?

झारखंड का कहना है कि खनिज उसकी जमीन में हैं और mining के सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव भी राज्य को झेलने पड़ते हैं, इसलिए राज्य को पर्याप्त fiscal powers मिलनी चाहिए।

केंद्र का तर्क है कि mining taxation में अलग-अलग राज्यों की अत्यधिक variation domestic minerals को महंगा कर सकती है और national economic interests प्रभावित हो सकते हैं।

अब आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई, केंद्र-राज्य बातचीत और झारखंड के राजनीतिक आंदोलन से इस विवाद की दिशा तय होगी।

फिलहाल एक बात साफ है—झारखंड के खनिजों को लेकर शुरू हुई यह लड़ाई आने वाले समय में भारत के fiscal federalism और natural-resource governance की बड़ी परीक्षा बन सकती है।SEO + Publishing Package

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